सपा-कांग्रेस गठबंधन के आसार, बातचीत आखरी दौर में

December 23, 2016, 1:55 pm
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यूसुफ अंसारी

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक साथ मिलकर लड़ सकते हैं। पिछले कई हफ्तों से दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन और सीट बंटवारे को लेकर जारी बातचीत आखिरी पड़ाव में पहुंच गई है। चुनाव की घोषणा के साथ ही इस गठबंधन का भी ऐलान हो सकता है।

कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उत्तर प्रदेस के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस गठबंधन को लेकर सीधे दूसरे के संपर्क में हैं। दोनों ही नेता एकदूसरे के साथ भविष्य की राजनीति में हमक़दम बनकर आगे बढ़ना चाहते हैं। दोनों पार्टियों के आला नेताओं के बीच साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सैद्धांतिक सहमनति तो बन गई है लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर रस्साकशी जारी है। कांग्रेस 125 से 150 सीटें मांग रही है लेकिन वो 106 सीटों पर समझौते का मन बना चुकी है। उधर समाजवादी पार्टी कांग्रेस को 58-60 सीटें ही देने की बात कर रही है लेकिन 75-100 सीटों त वो आगे बढ़ सकती है। सूत्रों को उम्मीद है कि दोनों पार्टियां भाजपा को सत्ता से दूर रखने के मकसद को तरजीह देंगी और सीटों के सम्मानजनक बंटवारे पर सहमति बनाएंगी।  

सूत्रों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के प्रभारी कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद और पर्देस अध्यक्ष राज बब्बर गठबंधन को लेकर सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से कई बार मिल चुके हैं। अखिलेश यादव कम से कम दो बार दावा कर चुके हैं कि अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन हुआ तो वो 300 से ज्यादा सीटें जीतेंगे। हालांकि शुरू में मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के साथ गठबंधन के हक़ में नहीं थे। उन्हें डर था कि राज्य में सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस फिर से जिंदा हुई तो उनका मुस्लिम वोट उनके हाथ से निकल जाएगा। अखिलेश ने अपनी सरकार बचाने और आगे चल कर कांग्रेस के साथ केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने की मंशा जताई तो सपा प्रमुख मुलायम पड़ गए। हालांकि वो कांग्रेस से हाथ मिलाने के हमेशा खिलाफ रहे हैं। जब कभी कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात चली मुलायम सिंह ने इसे तवज्जो नहीं दी। समाजवादी पार्टी ने वर्षों के प्रयास के बाद कांग्रेस को राज्य में हाशिए पर लाकर खुद को मुख्य 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टी के रूप में स्थापित किया है।

कांग्रेस में भी सपा और उसके अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव लेकर शुरू से ही गलतफहमियां रहीं हैं। इसी लिए कांग्रेस ने कभी दिल से मुलायम से हाथ मिलाने की कोशिश नहीं की। 2003 में मुलायम सिंह कांग्रेस के समर्थन से मुखयमंत्री बने। तब वो कांग्रेस को अपनी सरकार में शामिल करना चाहते थे लेकिन तब कांग्रेस ने राज्य इकाई की इच्छा के खिलाफ जाकर सरकार में हिस्सेदारी कबूल नहीं की। हालांकि बाद में 2008 मे यूपीए की सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ने मुलायम का ही सहारा लिया। आपसी विश्वास कायम न होने की वजह से 2009 में लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन होते-होते रह गया था। अब बदली परिस्थिति में राहुल गांधी का मानना ​​है कि वह मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ राजनीतिक रिश्ता रख सकते हैं, लेकिन सपा प्रमुख के साथ वह काफी असहज महसूस करते हैं।

दरअसरल दोनों पार्टियों के बीच संदेह और अविश्वास का पुराना इतिहास भी रहा है। 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी सपा प्रमुख के साथ गठबंधन की कोशिश में नाकाम साबित हुए थे। एक बार राजीव गांधी से मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ में गठबंधन की घोषणा करने का वादा किया और अगली सुबह दिल्ली से लखनऊ रवाना भीहो गए। मुलायम ने गठबंधन के ऐलान के बजाए विधानसभा भंग कर अपने दम पर ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी जिससे कांग्रेस को काफी निराशा हुई। तब मुलायम सिंह जनता दल से अलग होकर चंद्रशेखर  नेतृत्व मं बनी समाजवादी जनता पार्टी मे थे। बाद में 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई औक 1993 में पहला चुनाव बसपा के सथ मिल कर लड़ा।

दोनों पार्टियों के बीच जब भी गठबंधन पर बात हुई वह सिर्फ भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए की हुई है। इस बार भी मकसद यही है। दोनों पार्टियों में गठबंधन होने से मुस्लिम वोटों के बंटने का डर खत्म हो जाएगा। मुस्लिम समुदाय का सबसे बहड़ा हिस्सा इसी गठबंधन को मिलेगा। इससे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही कांग्रेस को भी राज्य में फिर से जीवनदान मिल जाएग। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में 71 सीटें और 42 फीसदी वोट प्रतिशत के साथ जीत दर्ज की थी। वहीं सपा 22.2 फीसदी वोट प्रतिशत के साथ 5 सीट जीत पाई थी और कांग्रेस 7.5 फीसदी वोट हासिल करके 2 ही लोकसभा सीट जीत सकी थी।

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