देश के चुनिंदा अफसरों की फर्जी डिग्रियों का पर्दाफाश

May 22, 2016, 1:07 pmSpecial
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यूसुफ़ अंसारी/आलोक कुमार

सियासी लोगों की डिग्रियों पर सवाल किए जा रहे हैं। सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक की डिग्रियों पर सवाल उठे। चर्चा भी खूब रही। लेकिन देश में ऐसे तमाम अफसर हैं, जिनकी डिग्रियां संदेह के दायरे में है। इन्होंने न सिर्फ ग़लत तरीके से डिग्री हासिल की बल्कि उसी डिग्री के आधार पर अपनी नौकरियों में लगातार तरक्की भी पाते रहे।

“सन स्टार” को जो दस्तावेज़ मिलें हैं उन्होंने डिग्री हासिल करने के लिए अपनाई गई अफसरों की तिकड़म की पोल खोल कर रख दी है। ये तमाम दस्तावेज आईसीएफआरई के पूर्व वैज्ञानिक डॉ हिलालुद्दीन ने आरटीआई यानि सूचना के अधिकार के तहत हासिल किए हैं। ये दस्तावेज़ हैरान करने वाली जानकारियां सामने लाते हैं। हमारे पास एक दो नहीं बल्कि ऐसे 60 लोगों की डिग्रियों से जुड़े दस्तावेज़ हैं। इन सबने गलत तरीक़ों से पीएचडी की डिग्री हासिल की है। इनमें से 14 ऐसे लोग हैं जिनकी थिसिस को ही परीक्षकों ने यह कह कर खारिज कर दिया था कि वो पीएचडी के लायक़ ही नहीं हैं। लेकिन तिकड़म का खेल देखिए कि कई बार थीसिस खारिज हो जाने के बावजूद ये सभी पीएचडी की डिग्री हासिल करने में कामयाब रहे। इन्हें डिग्री देने के लिए तमाम कायदे कानूनों को ताक पर रख दिया गया।

फर्जीवाड़ा करके पीएचडी की डिग्री हासिल करने वाले बाकी के 46 लोगों में से 38 नौकरशाह हैं। ये सभी अपनी पीएचडी की डिग्री के बूते तरक्की पाकर केंद्र और राज्य सरकारों में महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे हैं। इन 38 नौकरशाहों में से एक आईएएस अफसर है और बाक़ी के 37 भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं। इनमें दो की मौत हो चुकी है। लिहाज़ा हम यहां उनका जिक्र नहीं कर रहे। बाकी 35 अफसरों की डिग्री हासिल करने की जानकारी चौंकाने वाली भी है और हैरान करने वाली भी। जब आरटाई के तहत जानकारी मांगन का सिलसिला शुरू हुआ तो एक अफसर की डिग्री फर्जी पाए जाने पर विश्वविद्यालय कैंसिल कर दी गई। लेकिन बाक़ी अफसर अभी तक पीएचडी वाले डॉक्टर साहब बने हुए हैं।

यह पूरा मामला देहरादून में मौजूद देश के प्रतिष्ठित वन अनुसंधान संस्थान सम विश्व विद्यालय (FRI University) का है। यह विश्व विद्यालय भारतीय वानिकी अनुसंधान और शिक्षा परिषद के तहत चलता है। यहां से पीएचडी की डिग्री हासिल करके कई नौकरशाह ऊंचे ओहदे पाने में कामयाब रहे। कई लोग विश्व विद्यालय के कुलपति, नीति आयोग के सलाहकार, प्रधानमंत्री के सलाहकार मंडल के सदस्य, वन मंत्रालय के सलाहकार, विश्व बैंक के सलाहकार, जापान अंतर्राष्ट्रीय कॉपरेशन एजेंसी (जायका) जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं में निजी सलाहकार बने हैं। यहां से गलत तरीके से डिग्री देने और लेने वालों में वन और पर्यावरण मंत्रालय के डीजी फारेस्ट और विशेष सचिव डॉ शरद सिंह नेगी, दिल्ली में पदस्थापित हरियाणा वन विकास निगम के मुख्य प्रबंध निदेशक डॉ. विवेक सक्सेना, भोपाल आईएफएम के मौजूदा निदेशक डॉ जी ए किन्हाल, चेन्नई में पदस्थापित तमिलनाडु के मुख्य वन संरक्षक डॉ. सुधांशु गुप्ता, भुवनेश्वर में मौजूद ओडिशा रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन सेंटर के चीफ एक्सक्यूटिव अफसर डॉ. संदीप त्रिपाठी, आईसीएफआरई के डीजी डॉ अश्विनी कुमार, आईसीएफआरई में तैनात अंतरराष्ट्रीय समन्व्य के निदेशक डॉ एनएस बिष्ट, भारतीय वन सर्वेक्षण के डीजी सैबल दासगुप्ता जैसे वरिष्ठ नौकरशाह शामिल हैं।



आरटीआई के तहत मिली जानकारी से पता चलता है कि कई मामलों में पीएचडी का नामांकन आवेदन करने की तारीख से पहले ही कर लिया था। नियम है कि जिस दिन आवेदन फीस जमा करते हैं उन दिन से ही एडमिशन माना जाता है। लेकिन कई मामलों में पहले पीएचडी का एडमिशन पहले हुआ और फीस बाद में जमा हुई। कुछ मामलों में तो एडमिशन के दो महीने बाद फीस जमा हुई तो कई मामलों में सात महीने बाद फीस जमा की गई। हाल ही में नैतिकता के आधार पर उत्तराखंड कर्मचारी चयन आयोग से इस्तीफा देने वाले आईएफएस डॉ. आर बी एस रावत का मामला बेहद दिलचस्पल है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक डॉ. रावत ने केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के दौरान बग़ैर स्टडी लीव या एनओसी लिए ही अपनी रिसर्च उत्तराखंड के जंगलों में पूरी की। भला ये कैसे मुमकिन है कि एस अफसर सरकारी दफ्तर में नौकरी भी करे और जंगलों में जा कर रिसर्च भी कर ले।

तमिलनाडु के मुख्य वन संरक्षक डॉ. एस कल्याण सुंदर भी ऐसी ही शख्सियतों में शामिल हैं। देश के इन ‘होनहार’ वन रक्षकों ने बिना सरकारी इजाज़त के राष्ट्रीय उद्यान एवं वन्यजीव अभ्यारणों में घूमकर अपनी रिसर्च पूरी की है। बिना कानूनी इजाज़त के इन जगहों पर जाना और रिसर्च करना करना दंडनीय अपराध है। भारतीय वन्यजीव अधिनियम 1972 के तहत ऐसे अपराध के लिए तीन साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। इस धारा के उल्लंघन करके पीएचडी हासिल करने वाले अधिकारी ही लोगों को जेल भेजते रहे हैं। गौरतलब है कि फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीच्युट देहरादून (एफआरआईई) का निदेशक ही एफआरआई डीम्ड यूनिवर्सिटी, देहरादून का कुलपति होता है। यह भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद के अंतर्गत आता है जो कि वन एवं पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की स्वायत्त इकाई है। पीएचडी करने और कराने का जो खेल यहां चल रहा है वो हमारी पूरी व्यवस्था को अंगूठा दिखाता है।

इसके कुलाधिपति डॉ अश्विनी कुमार , आईएफएस विश्वविद्यालय के चांसलर हैं।
डॉ कुमार भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद, देहरादून के महानिदेशक भी हैं। डॉ. अश्विनी कुमार के सुपरविजन में 8 शोधकर्ताओं ने पीएचडी डिग्री हासिल की है। इनमें से 6 आईएफएस अधिकारी हैं। यहां तक कि विश्वविद्यालय की कुलपति - डॉ. सविता, आईएफएस ने भी पीएचडी एफआरआई विश्वविद्यालय से ही केंद्र सरकार में प्रतिनियुक्ति दौरान की है। इन्होंने पीएच डी करने के लिए जरूरी एनओसी अपने पति श्री अजय कुमार, आईएफएस से ली है। श्री अजय कुमार उस वक्त केंद्र सरकार में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में डायरेक्टरेट ऑफ फॉरेस्ट के निदेशन हुआ थे। डॉ. सविता भी उन दिनों केंद्र सरकार इसी विभाग में अजय कुमार के साथ प्रतिनियुक्ति पर थी। आईएफएस अजय कुमार ने भी इसी विश्वविद्यालय में पीएचडी में नामांकन कराया था और मंत्रालय के एडिशनल डायरेक्टर जनरल से एनओसी के लिए आवेदन किया था। अपने आवेदन पत्र में उन्होंने लिखा है कि एफआरआई विवि में पीएचडी के लिए क्लास करने की जरूरत नहीं है। इसलिए पीएचडी के दौरान उनका कोई सरकारी काम बाधित नहीं होगा। श्री अजय कुमार के नामांकन के दो आवेदन में अलग अलग जानकारियों मौजूद हैं। उनकी प्रत्यापित कॉपी हमारे पास हैं।

डॉ नीलू गेरा, आईएफएस, विश्वविद्यालय की वेबसाईट के मुताबिक एफआरआई यूनिवर्सिटी की डीन हैं।
इनको पीएचडी के लिए कम से कम सौ क्लास करनी थी। इसका उल्लेख इनके पीएचडी के लेटर ऑफ एडमिशन ऑफर में था। उसके लिए एकडमिक अवकाश की जरूरत पड़ती है। इन्होंने ली नहीं और एक भी क्लास नहीं की। प्रतिनियुक्ति एफआरआई में थी। सरकारी कामकाज करते हुए पीएचडी करती रही। इन्होंने पीएचडी के लिए दो एनओसी लगाई। एक प्रतिनियुक्ति वाले विभाग के निदेशक की, दूसरी सचिव आईसीएफआरई की। दोनों डॉ गेरा को एनओसी देने के लिए अधिकृत अधिकारी नहीं थे। इनरोलमेंट के लिए स्टडी लीव महीने भर के अंदर लेनी होती है। डॉ गेरा ने इनरोलमेंट के चार साल बाद स्टडी लीव ली। पीएचडी शोध के आरंभिक चार साल तक प्रतिनियुक्ति पर थी। फिर राज्य सरकार से स्टडी लेकर एफआरआई यूनिवर्सिटी में पीएचडी करती रहीं। तो सात साल के अंदर पीएचडी जमा होने के आखिरी दिन इन्होंने थेसिस जमा कर दी। जब एनरोलमेंट होता है तो हर छह महीने पर सुपरवाइजर विश्वविद्यालय को प्रोग्रेस रिपोर्ट भेजता है। जिसके मूल्यांकन पर छात्र का एडमिशन जारी रहेगा या नहीं यह तय होता रहता है। शुरू के चार साल तक इनके सुपरवाइजर डॉ एन एस बिष्ट रहे। बिष्ट खुद भी आईएफएस अधिकारी हैं और उन दिनों एसीएफआरई में प्रतिनियुक्ति पर थे। बिष्ट इनको लगातार संतोषजनक रिपोर्ट देते रहे। जब इनका काम संतोषजनक था, तो इनको विशेष परिस्थितियों में दो साल के एक्सटेंशन लेने की जरूरत क्या थी। उसी एक्सटेंशन के दौरान इन्होंने स्टडी लीव ली। इनको पीएचडी एनरोलमेंट के बारह साल बाद डिग्री अवार्ड हुई। इन्होंने पीएचडी की प्रस्तावना में स्वंय लिखा है कि इनके शोध के आंकड़े किसी और ने इक्ट्ठा किए थे। और डाटा इक्ट्ठा करने वालों का शुक्रिया अदा किया है। जबकि थेसिस के अंदर मेथडोलॉजी के सेक्शन में लिखा है कि डेटा इन्होंने ने खुद इकट्ठा किया है। इसी बात का सर्टिफिकेट इनको इनके सुपरवाइजर डॉ एन एस बिष्ट ने दिया है।

पूर्व वीसी डॉ एस एस नेगी, आईएफएस, विशेष सचिव एवं डीजी, पर्यावरण, वन एवं जलवायु मंत्रालय, भारत सरकार
इन्होंने एफआरआई के निदेशक रहते हुए आईएफएस डॉ हरजीत सिंह को एनओसी दी। आईएफएस डॉ. सिंह प्रतिनियुक्ति पर एफआरई आए थे जिन्होने प्रतिनियुक्ति के दौरान लीव लिए बिना पीएचडी जैसा गंभीर शोधकार्य पूरा कर लिया। डॉ नेगी आईएफएस डॉ सिंह को एनओसी देने के लिए अधिकृत अधिकारी नहीं थे। डॉ नेगी ने स्वंय भी सरकार में रहते हुए बिना स्टडी लीव लिए पीएचडी की है। डॉ नेगी ने केंद्र के अधीन प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए कई लोगों को पीएचडी कराई है। और डेढ सौ से ज्यादा किताबें लिखी हैं। जिसमें से काफी किताबें अन्य लेखकों की किताबों की कॉपी पेस्ट (plagiarism) हैं। इनकी एक पुस्तक “Handbook of Fir and Spruce of the world” का रिव्यू ए ब्लंट केस ऑफ प्लागियरिज्म- डॉ. एस.एस नेगी (ABlatant Case of Plagiarism by Dr S.S. Negi ) एक विश्व प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय जनरल टैक्सॉन में अमेरिका के एक प्रोफेसर Dr Rudolf Schmid ने लिखा है। वो कहते हैं कि डॉ. नेगी की जो किताबें उन्होंने पढ़ी हैं उन सबको Musium of Plagiarism में रख देना चाहिए। वह आगे लिखते हैं डॉ नेगी ने भारतीय साइंस की जबरदस्त प्रतिष्ठा गिराई है। वो समापन में लिखते हैं जैसे एक चोर हमेशा चोरी करता है वैसे ही प्लागियरिस्ट डॉ नेगी प्लागिरिज्म करते हैं।

डॉ. एन एस बिष्ट, निदेशक, अंतर्राष्ट्रीय समन्वय आईसीएफआरई।
इन्होंने प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए आठ लोगों को इन्होंने पीएचडी कराई है। इसमें डॉ नीलू गेरा, डॉ सैबोई सिंगसित Seiboi Singsit IFS (Retd.), डॉ आर बी एस रावत IFS (Retd), Dr D.N. Singh, IFS आदि शामिल हैं। इन सभी की पीएचडी सारे नियमों को ताक पर रखकर की गई हैं। और ये सभी पीएच डी के दौरान केंद्र विभागों में प्रतिनियुक्ति पर थे।
डॉ. सुधांशु गुप्ता, पूर्व सचिव, आईसीएफआरई।
फिलहाल तमिलनाडु के मुख्य वन संरक्षक हैं। इन्होंने आईसीएफआरआई के सचिव रहते हुए अधिकृत नहीं होने के बावजूद पीएचडी के लिए प्रतिनियुक्ति पर आए आईएफएस अधिकारियों को थोक के भाव एनओसी देने का काम किया। जो प्रतिनियुक्ति पर नहीं होते हैं, उनको पीएचडी के लिए उनके राज्य का विभागाध्यक्ष यानी संबंधित विभाग का प्रमुख सचिव स्तरीय अधिकारी एनओसी देता है। डॉ गुप्ता एमएस्सी स्टेटिक्स में हैं। लेकिन फर्जीवाडा करके पीएचडी लाइफ साइंस में कर गए। इन्होने भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के प्रावधानों को ताक पर रखकर बिना अनुमति लिए राजाजी राष्ट्रीय उद्यान में शोध किया। इनके बारे में अप्रैल 2014 में सीएजी ने अपने ऑडिट में लिखा है कि ये व्यक्ति नियमों को ताक पर रखकर काम करने में माहिर हैं। यह सुप्रीम कोर्ट, हाइ कोर्ट, कैट के ऑर्डर नहीं मानता है। ये प्रधानमंत्री, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एवं विधि मंत्रालय के आदेशों को भी नहीं मानता। ये अनाधिकृत तरह से निरंतर पांच साल ज्यादा प्रतिनियुक्ति पर बने हुए हैं। सीएजी कहती है कि उनकी समझ से बाहर की बात है कि ये शख्स डीजी के साथ मिलकर किन नियमों से आईसीएफआरई को चला रहा है। ऑडिट उस समय का है जब ये आसीएफआरई का सचिव थे। इसी तरह नियम के मुताबिक जो प्रतिनियुक्ति पर होते हैं उनको स्टडी लीव नहीं दी जा सकती। और स्टडी लीव या वाजिब तरीके से लिए गए एनओसी के बिना पीएचडी करना मुमकिन नहीं है। प्रतिनियुक्ति वालों को किसी हालत में स्टडी लीव नहीं दी जा सकती है। और एनओसी उस हालत में दी जा सकती है जब वह ऑफिस के समय के बाद यानी रात में कोई कोर्स कर रहे हों। लेकिन एफआरआई यूनिवर्सिटी में पीएचडी फुलटाईम कोर्स है।

डॉ संदीप त्रिपाठी , सीईओ, ओडिशा रिमोट सेंसिंग एप्लिकेशन सेंटर, भुवनेश्वर
इन महाशय ने लेटर ऑफ एडमिशन ऑफर जारी होने के दस दिन पहले ही एफआरआई यूनिवर्सिटी में फीस जमा कर दी थी। इन्होंने स्नातकोत्तर साईंस में किया और पीएचडी लाइफ साइंस में एफआरआई से प्रतिनियुक्ति के दौरान ले ली। इन्होंने अपना एनओसी खुद से खुद को दिया। राजवीर सिंह, आसीएफआरई एवं फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिय में में प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए पीएचडी में एनरोल हुए । 9 मार्च 2013 को डॉ सुधांशु गुप्ता ने अनुमति दी थी। दूसरा एनओसी 23 अगस्त 2012 को डायरेक्टर फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया से कंडिशनल एनओसी लिया। परमिशन लेता जा रहा है। सूचना के अधिकार के तहत 46 लोगों की पीएचडी संबंधी कागजात मागे गए। यह 20 जून 2014 से अबतक लगातार मांगी जानकारियों का ब्यौरा है। इनमें 38 ने फर्जीवाड़ा से पीएचडी की डिग्री हासिल की। एफआरआई यूनिवर्सिटी ने इनके दाखिले से संबंधित सत्यापित कागजात उपलब्ध कराए हैं। इनसे साफ होता है कि इन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल करने में भारी फर्जीवाड़ा किया है। ग़लत तरीकों का इस्तामाल करके पीएचडी हासिल करने वालों में 37 भारतीय वन सेवा के अधिकारी हैं और एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी हैं। ये तमाम दस्तावेज “सन स्टार” के पास मौजूद हैं। केंद्र सरकार या किसी भई जंच एजेंसी के मांगे जाने पर ये तमाम दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जा सकते हैं। पीएचडी के लिए 3 में से सिर्फ चार लोगों ने स्टडी लीव ली। उसमें से डॉ नीलू गेरा ने चार साल बाद स्टडी लीव ली। डॉ.आर डी जकाती, आईएफएस ने जो कि आईएफएनएफए में प्रतिनियुक्ति पर थे। प्रतिनियुक्ति खत्म होने के बाद यानी पीएच. डी में नामांकन के चार साल बाद दो साल की स्टडी लीव ली। इनके लिए सुपरवाइजर की ओर से हर छह महीने पर यूनिवर्सिटो को संतोषजनक रिपोर्ट भेजता रहा। जब उसकी प्रोग्रेस रिपोर्ट संतोषजनक जाती रही, तो चार साल के बाद स्टडी लीव लेने की जरूरत ही नहीं थी।

डॉ सुहास कुमार, आईएफएस (वर्तमान में अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक वन्यजीव, मध्य प्रदेश)
इनकी स्टडी लीव का रिकार्ड विश्वविद्यालय के पास नहीं है। हालांकि डॉ कुमार ने उनके संज्ञान में आने के बाद स्टडी लीव की प्रतिलिपि उपलब्ध कराई है। 32 में से 22 लोग प्रतिनियुक्ति पर आईसीएफआरई, आईजीएनएफए, एसएफएस कॉलेज, वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार एवं केंद्र सरकार के अन्य विभागों में आए थे। और एफआरआई यूनि से बिना एनओसी एवं बिन स्टडी लीव लिए पीएचडी करके चले गए। ये प्रतिनियुक्ति के नाम सरकारी कामकाज के पद पर रहते हुए राजकीय कोष से तन्ख्वाह लेते रहे। प्रतिनियुक्ति पर किसी अधिकारी को किसी खास लक्ष्य निर्धारित काम के लिए बुलाया जाता है, इसके लिए उसे दस प्रतिशत से ज्यादा सैलरी अतिरिक्त दी जाती है। हमारी टीम ने इनमें से 12 लोगों की पीएचडी पढ़ी है। उसको पढ़ने के बाद पाया कि ये अधिकारी एक ही समय में दिल्ली, देहरादून, भोपाल बैंगलोर एवं शहरों में प्रतिनियुक्ति का काम करते रहे औऱ साथ साथ उसी समय अरूणांचल, उतराखंड, हरियाणा, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, केरल आदि राज्यों के जंगलों में शोध का डाटा कलेक्शन करते रहे। डॉ विवेक सक्सेना। क्या यह संभव है कि एक ही वक्त में एक शख्स कई जगहों पर एक साथ मौजूद रहे। वह पर्यावरण मंत्रालय में फाइलों को साइन कर रहा हो, ओएसडी रहकर भारत सरकार के मंत्री का काम संभाल रहा हो एवं उसी समय सुदूर जंगलों में डाटा इक्ट्ठा कर रहा हो। ऐसा कमाल करने वाले शख्स का नाम है डॉ विवेक सक्सेना। हालांकि अपनी थीसिस की प्रस्तावना में उत्तर प्रदेश, हरिय़ाणा एवं अन्य राज्यों के अधिकारियों का शुक्रिया अदा कर रहे हैं कि जंगल में धूम धूमकर उनके लिए डेटा इक्ट्ठा करते रहे। लेकिन थेसिस के मेथडलोजी सेक्शन में खुद डेटा कलेक्शन करने का विरोधीभासी दावा करते हैं। इनकी पीएचडी गाइड डॉ नीता हुड्डा, आईएफएस पूरी शोध कालखंड में अमेरिका में वर्ल्ड बैंक में बैठी थीं। थेसिस जमा करते वक्त डॉ सक्सेना को नियमानुसार भारतीय गाइड की जरूरत पड़ी, तो आईसीएफआरई में नए -नए प्रतिनियुक्ति पर आए श्री सैबाल दासगुप्ता, आईएफएस, को अपना गाइड बनैकर पेश कर दिया। ताज्जुब की बात तो ये है कि दासगुप्ता खुद पीएचडी नहीं है। मौजूदा समय में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के डीजी हैं। इन्होंने उनसे एक प्रमाणपत्र ले लिया कि इन्होंने कई साल तक जंगलों में घूम घूमकर उनके निर्देशन में डाटा एकत्रित किया है। जबकि सैबाल दासगुप्ता खुद सक्सेना के डाटा कलेक्शन के दौरान मध्यप्रदेश वन विभाग में पोस्टेड थे। संभव है कि मंत्री का ओएसडी होने की पॉवर का इस्तेमाल करते हुए डॉ सक्सेना ने अपने फायदे के लिए सैबाल दासगुप्ता को मध्यप्रदेश से निकालकर आईसीएफआरई में प्रतिनियुक्ति पर लाने का काम किया हो। उसके एवज में सैबाल दासगुप्ता से सर्टिफिकेट हासिल कर लिया। पीएचडी का थेसिस और शोध तैयार करने वाले आईएफएस में कई ऐसे हैं जिन्होंने अपने करीबी रिश्तेदारों से एनओसी हासिल किया है। मसलन पत्नी ने पीएचडी में इनरॉल्मेंट के लिए पति से एनओसी ले ली। एक मामले में तो हद हो गई, एक अधिकारी ने खुद को ही एनओसी अपने आप से जारी कर लिया।

डॉ.पी पी भोजवेद, अतिरिक्त प्रमुख वन संरक्षक (वन्य जंतु) हरियाणा सरकार..
डॉ राकेश कुमार शर्मा पूर्व प्रधान सचिव, मुख्यमंत्री, उत्तराखंड
एक आरटीआई से 14 लोगों की जानकारी मिली जो 46 शोधार्थियों की सूची से अतिरिक्त है। इसी आरटीआई में उत्तराखंड के प्रधान सचिव डॉ राकेश कुमार शर्मा की जानकारी शामिल है। डॉ शर्मा अर्थशास्त्र में एमए हैं। इनको फॉरेस्ट साइंस में पीएचडी करायी गई है। इन्होंने अपनी पीएचडी के सुपरवाईजर का एसीआर लिखा है। इनके सुपरवाइजर डॉ जे के रावत, आईएफएस हैं। डॉ रावत एफआरआई यूनिवर्सिटी के कुलपति रहे हैं। रावत उतराखंड के प्रिंसिपल चीफ कंजरवेटर ऑफ फारेस्ट रहे हैं। तब डॉ शर्मा इनके आला अधिकारी हुआ करते थे। डॉ शर्मा ने 14 साल में पीएचडी हासिल की। जबकि पीएचडी हासिल करने की मानक अवधि है पांच साल है। विशेष परिस्थितियों में एक साल का एक्सटेंशन मिलता है यानी छह साल में पीएचडी पूरी करनी होती है। अतिविशिष्ट परिस्थि में एक साल का विस्तार और दिया जा सकता है। ऐसे में सात साल की अधिकतम सीमा में पीएचडी थिसिस जमा कर लेना होता है। इनको पीएचडी दिलाने के लिए एकडमिक कॉसिल की बैठक बुलाई गई औऱ उसके जरिए पीएचडी के थेसिस को स्वीकार करने के तय मानकों से खिलवाड़ किया गया। इनके मामले में एकडमिक कॉसिल की बैठक के जरिए कुलपति डॉ पीपी भोजवाद ने एकडमिक कौंसिल की पॉवर पहले अपने हाथ में ले ली। बाद में विवेकाधिकार और विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए डॉ राकेश कुमार शर्मा की थिसिस 14 साल बाद जमा करवा दी। जिसके आधार पर उन्हें डिग्री अवार्ड की गई। गौरतलब है कि पीएचडी की डिग्री हासिल करते वक्त डॉ शर्मा उत्तराखंड सरकार के मुख्य सचिव थे। और रिटायरमेंट के बाद उन्हें मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपना प्रधान सचिव बना लिया। एक अन्याय मामले में 14 शोधकर्ता जिनकी थेसिस उनके तीसरे एक्जामनर ने भी रिजेक्ट कर दी थी, उनकी थेसिस नियम के साथ खिलवाड़ करके छोटे एक्जामनर को भेज दी और उसकी रिपोर्ट के आधार पर डिग्री अवार्ड कर दी। यहां ये जानना जरूरी है कि पीएचडी की थेसिस जमा की जाती है, तो उसकी मेरिट के आंकलन के लिए दो अलग अलग विशेषज्ञों के पास बाहर भेजी जाती है। उनकी राय से यह तय होती है कि थेसिस की गुणवत्ता के आधार पर पीएचडी डिग्री दी जाए या नहीं। यदि दोनो एक्जामनर की राय में डिग्री देना उचित होता है, तो शोधार्थी का वाइवा कराकर डिग्री दे दी जाती है। यदि दो में से एक ने थेसिस को पीएचडी लायक नहीं माना, तो उसे तीसरे के पास भेजा जाता है। उन तीन में से बहुमत के आधार पर डिग्री दी जाए या नहीं यह तय होता है। आरटीआई के खुलासे में सामने आया है कि एफआरआई यूनि से पीएचडी करने वाले 14 लोग ऐसे हैं, जिन्हें पहले दो में से एक ने डिग्री देने की राय नहीं दी थी। नियम अनुसर इनकी थेसिस तीसरे एक्जामनर के पास भेजी गई तो तीसरे ने भी रिजेक्ट कर दिया। ऐसे में नियम अनुसार शोधार्थी को फेल मान लिया जाता है। मगर तीसरे की रिजेक्शन को अनसुना कर दिया गया। एकडमिक कौंसिल की बैठक में यह तय किया गया कि इन 14 लोगों की थिसिस को चौथे एक्जामनर को भेज दिया जाए। इस चौथे का निर्णय ही अंतिम होगा। डॉ भोजवेद ने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए इन सभी की थिसिस को चौथे एक्जामनर के पास भेजा। उसकी रिपोर्ट के आधार पर सभी 14 लोगों को मौलिक नियम की धज्जियां उड़ाते हुए पीएचडी की डिग्री अवार्ड कर दी गई।

डॉ आर बी लाल, आईएफएस इनको 15 मार्च 94 को यूनिवर्सिटी ने एडमिशन ऑफर लेटर दिया जिसमें 28 सितंबर 93 की आवेदन को मानते हुए उसी दिन से एडमिशन दिया गया। हद तो तब हो गई जब 26 अक्टूबर 93 को इन्होंने थिसिस जमा कर दी यानी कि एडमिशन होने से से छह महीने पहले थिसिस जमा कर दी थी। यहां ये ध्यन देने की बात है कि नियमानुसार एफआरआई यूनिवर्सिटी में एडमिशन तभी निश्चित मना जाता है जब तक फीस जमा हो जाती है। यहां ध्यान देने वली बात है कि डॉ. लाल ने फीस जमा की 08-04- 94 को और थेसिस जमा की 26.10.93 को। यानी एडमिशन हुआ 1994 में और थेसिस जमा हो गई 1993 में।

डॉ एच एस पाबला, आईएफएस
इन्होंने जिस दिन नामांकन के लिए आवेदन किया उसी दिन इनका नामांकन कर लिया गया। डॉ. एस पी कुलश्रेष्ठ ने जिस दिन आवेदन किया उसके अगले दिन नामांकन मिल गया। डॉ. आर के भराथी, 27/8/ 2001 को आवेदन किया। 23/10/2001 को आरएसी बैठी लेकिन उनका एडमिशन 01/09/2001 को हो चुका था। नियम के अनुसार आवेदन के बाद उसे रिसर्च डिग्री कमेटी (आरडीसी) सिनोप्सिस और आवेदन को कंसिडर करती है। फिर अनुमोदन करती है रिसर्च एडवाइजरी कमेटी (आरएसी) को। यह एडमिशन देने या न देने का आखिरी फैसला लेती है। इसमें अमूमन तीन से छह महीने लगते हैं। मेंबर्स को बुलाने के लिए कम से कम बीस दिन का नोटिस देना होता है।

डॉ. पी के घोष, आईएफएस
इन्होंने सौ दिन के अनिवार्य क्लास को सौ घंटे में परिवर्तित करा लिया।
डॉ. डी ए वेंकटेश
इन्होंने जब आवेदन किया, उसके 19 महीने के बाद अगले सेशन में उसी आवेदन पर एडमिशन दे दिया गया। यूपीएससी में चयनित होने के बाद आईएफएस कैटोगरी के अधिकारी बनते हैं। उनको प्रशिक्षण के लिए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी (आईजीएनएफए), देहरादून में प्रशिक्षण दिया जाता है। यह Forest Research Institute के प्रांगण में है। यहां 1991 से एफआरआई डीम्ड यूनिर्सिटी चल रही है। एफआरआई डीम्ड यूनिवर्सीटी के शिक्षा परिषद की 1998 की बैठक में प्रस्ताव पारित कर आईएफएस की ट्रेनिंग पाठ्यक्रम को पूरा करने को मास्टर्स की डिग्री के समतुल्य मान लिया गया। बैठक में संस्थान के चांसलर, कुलपति, डीन व रजिस्टार जो आइएफएस थे। प्रस्ताव में कहा गया कि आईएफएस को ट्रेनिंग के दौरान पढ़ाया जाने वाला पाठ्यक्रम एम.एससी फोरेस्ट्री के पाठ्यक्रम से मिलताजुलता है लिहाज़ा उसके प्रशिक्षण प्रमाणपत्र को ही एमएससी की डिग्री के बराबर मान लिया जाए। ऐसा भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के बाद लाल बहादुर शास्त्री प्रशासनिक प्रशिक्षण अकादमी, मसूरी में आरंभिक दो साल के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम और भारतीय पुलिस सेवा में चयन के बाद सरदार पटेल प्रशिक्षण संस्थान, हैदराबाद के आरंभिक दो साल के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम साथ कदापि नहीं होता है। हालांकि आरटीआई में खुलासा किया गया है कि यूजीसी ने आईजीएनएफए की ओऱ से प्रशिक्षण प्रमाणपत्र को एमएससी के समतुल्य मानने से इंकार कर दिया है। लेकिन एफआरआई यूनिवर्सिटी 1998 के अपने प्रस्ताव को आधार मानकर आजतक उसे एमएससी के समतुल्य ही मान रही है। उसी के प्रमाणपत्र के आधार पर सामान्य स्नातक आईएफएस अधिकारियों को सीधे पीएचडी में दाखिला देकर उपकृत कर रही है। बात यही खत्म नहीं होती बल्कि 1999 में एफआरआई के शैक्षणिक परिषद की बैठक में राज्य वन सेवा अकादमियों में चल रहे प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को एमएससी के समतुल्य मान लिया गया है। उसके आधार पर राज्य अकादमियों से प्रशिक्षित वन सेवा अधिकारियों को सीधे पीएचडी में दाखिला दिया जा रहा है। इस खेल के जरिए एफआरआई यूनिवरस्टी ने कुछ राज्यों में बारहवीं पास को भी पीएचडी कराने का शॉर्टकट निकाल लिया गया है। रेंज अधिकारी के लिए बारहवी पास होना ज़रूरी है। ये रेंज अधिकारी कुछ सेवाकाल के बाद प्रोन्नोति पाकर एसएफएस (स्टेट फॉरेस्ट सेवा) के अधिकारी बन जाते हैं। फिर ये अपनी राज्य अकादमियों से प्रशिक्षण हासिल कर लेते हैं। उनको प्रशिक्षण के प्रमाणपत्र के आधार पर सीधे एफआरआई यूनिवर्सिटी से पीएचडी में दाखिले की पात्रता मिल जाती है।

शिकायत पर नहीं हुई कोई कार्रवाईः डॉ हिलालुद्दीन
आरटीआई के तहत सारे दस्तावेज़ जुटाने वाले डॉ हिलालुद्दीन ने जून 2015 में माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी, वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, भारतीय वन अनुसंधान परिषद के महानिदेशक एवं कुलपति एफआरआई यूनिवर्सिटी इस फर्जीवाड़े की जानकारी देते हुए चिट्ठी लिखी और इस मामले की जांच कराके दोषियों के खिलाफ़ कार्रवाई करने की मांग की थी।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हिलालुद्दीन की शिकायत आईसीएफआरआई को भेज दी है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 27 जुलाई 2015 को इसकी जांच के लिए संयुक्त सचिव स्तरीय अधिकारी को आदेश भी दिया। वह खुद आईएफएस अधिकारी हैं। क़रीब साल भर बाद भी जांच रत्ती भर भी आगे नहीं बढ़ी है। आरटीआई के तहत ली गई फाइलों की नोटिंग से ये खुलासा हुआ है। इनकी प्रति भी “सन स्टार” के पास मौजूद है। बाकी मंत्रालयों या विभागों की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला है।

डॉ हिलालुद्दीन ने जून 2015 मे ही दिल्ली पुलिस आयुक्त लिखित शिकायत करके एफआईआर दर्ज करके इस पूरे मामले की जांच की गुहार लगाई। दिल्ली पुलिस ने शिकायत तो दर्ज की लेकिन जांच करने से साफ इनकार कर दिया। दिल्ली पुलिस का तरफ से नियुक्त किए गए जांच अधिकारी सब इंसपेक्टर मनीष अब हिलालुद्दीन का फोन तक नहीं उठाते।

“सन स्टार” ने खुलासा करने से पहले इन तमाम अधिकारियों को उनके निजी इ-मेल पर मेल भेजकर इस पूरे मामले की जानकारी दी और उनके उनकी प्रतिक्रिया मांगी लेकिन किसी भी अधिकारी ने मेल का जवाब नहीं दिया। अधिकारियों को भेजी गई मेल की प्रति हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं।

राज्यसभा में उठा था मामला
मार्च 2015 यह मामला राज्यसभा में कांग्रेस नेता अहमद पटेल ने भी उठाया था। उनके सवाल का जवाब एफआरआई के रजिस्टार डॉ एके त्रिपाठी और कुलपति डॉ सविता के संयुक्त हस्ताक्षर से दिया गया। इन्होंने जवाब में लिखा है कि जितने भी आईएफएस को पीएचडी दी गई है वो नियमानुसार है। और कोई धांधली नहीं की गई है। यह माननीय संसद की अवमानना है। सीआईसी के आदेशानुसार इन्होंने आरटीआई में बताया सचिव, भारतीय वन अनुसंधान परिषद या निदेशक वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून एनओसी देने के लिए अधिकृत नहीं हैं। यह जनवरी 2016 के आरटीआई में बताया गया है।

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