आलिम नहीं, ज़ालिम हैं तीन तलाक के पैरोकार

December 12, 2016, 11:02 am
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यूसुफ़ अंसारी

इलाहबाद हाई कोर्ट के ऑब्जर्वेशन के बाद बाद ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कड़ा रूख अख्तियार करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का ऐलान किया है। ताज्जुब की बात ये है कि तमाम मुस्लिम संगठन, आलिम एक सात दी गई तीन तलाक को ग़लत मानते हैं। इसे कुरान के खिलाफ मानते है लेकिन इसे इसे ख़त्म करने के सावल पर वो खामोश हो जाते हैं। तमाम आलिमों की राय में तीन तलाक़ एक बिदअत यानि इस्लाम की तालीमात के बाद में बाहर से जोड़ी गई एक परंपरा है। अब सवाल उठता है कि अगर तीन तलाक एक बिदअत है तो फिर तमाम आलिम इसे ख़त्म करने के लिए आगे क्यों नहीं आते। तमाम आलिम ये कहते नहीं थकते कि इस्लाम ने औरतों को 1400 साल पहले जो अधिकार दिए हैं वो किसी और धर्म ने नहीं दिए। जब मुस्लिम औरतें अपने इन्ही अधिकारों के हासिल करन के लिए आवाज़ उठाती हैं तो यही आलिम उनकी आवाज़ दबान मे कोई क़सर नहीं छोड़ते। आखिर ये आलिम एक साथ तीन तलाक देकर कर घर से निकाली गई औरतों को उनका हक़ दिलाने की पहल क्यों नहीं करते।   

सबसे पहले नजर डालते हैं कि शरीयत यानि इस्लामी कानून तीन तलाक़ पर क्या कहता है। भारत में प्रचलित शरीयत के मुताबिक अगर कोई शौहर अपनी बीवी को एक साथ तीन बार तलाक बोल दे तो उसका तलाक हो जाता है। चाहे वो गुस्से में हो या फिर नशे में। इसके मुताबिक फोन पर, एसएमएस से, ई-मेल से भी तलाक हो जाता है। बीवी सुने या ना सुने तलाक हो जाता है। सोती हुई बीवी को भी शौहर तलाक दे सकता है। अगर शौहर बीवी को आमने सामने तलाक नहीं देना चाहता तो वो किसी और से भी अपनी बीवी से कहलवा सकता है कि उसने उसे तलाक दे दिया है। साधारण डाक या रजिस्टर्ड डाक से चिट्ठी भेज कर भी तलाक दी जा सकती है। इंटरनेट पर चैंटिंग के जरिए, स्काइपे या फेसबबुक पर वीडियो कॉलिंग के जरिए भी तलाक जी सकती है। किसी को अगर शक हो तो दुनिया भर में मशहूर इस्लामी शिक्षा के केंद्र दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट पर जाकर फतवे देख सकता है। इन फतवों में देवबंद के आलिमों ने ऐसे तमाम तरीकों से दी गई तलाक़ को जायज़ करार दिया है। यहां तक कि कि अगर शौहर कहे कि उसकी नीयत तलाक देने की नहीं थी। उसने बेख्याली या गुस्से में तलाक़ दे दी। उलेमा ये दलील नहीं मानते। देवबंद से जारी ज्यादातर फतवों में शौहर को अपनी पत्नी को वापिस पाने के लिए जायाज़ हलाला कराने की नसीहत दी गई है।

शरीयत का पहला स्रोत कुरान है। देखते हैं कि तलाक पर कुरान क्या कहता है। सूराः बक़रा की आयत न. 25 में कहा गया है, “अल्लाह तुम्हारी अनजानी सौगंधो पर तुमको नहीं पकड़ता, बल्कि वह उस संकल्प पर पकड़ता है जो तुम पक्के इरादे से करते हो। और अल्लाह क्षमा करने वाला और सहनशील है।” इससे साफ है कि अगर कोई शौहर कहे कि उसने गलती से गुस्से में या नशे की हालत में तलाक दिया है। तलाक का उसका इरादा नहीं था तो कुरान के हिसाब से उसे माफी मिलनी चाहिए। अल्लाह माफ करने वाला, सहनशील और रहम करने वाला है। अफसोस कि हमारे उलेमा रहमदिल, सहनशील और माफ करने वाले नहीं है। इसी सूराः बक़रा की आयत न. 226 में कहा गया है, “जो लोग अपनी बीवियों से न मिलने की कसम खा लें तो उनके लिए चार महीन की मोहलत है। वो अपनी पत्नी की तरफ लौट आएं तो अल्लाह क्षमा करने वाला दयावान है।” अगली सूराः 227 में कुरान कहता है, “अगर वो तलाक का फैसला करें तो वास्तव में अल्लाह सुनने वाला और जानने वाला है।” अगली आयत न. 228 में ताकीद है, “तलाक दी हुई औरतें अपने आप को तीन मासिक धर्मों तक रोके रखे। अगर वो अल्लाह और क़यामत के दिन पर यक़ीन रखती हो तो उनके लिए जायाज़ नहीं कि वो उस चीज़ को छुपाए तो अल्लाह ने उनके गर्म में पैदा किया है। और इस बीच अगर उनके पति संबंधों को सुधारना चाहें तो वो उनको लौटा लेने का ज्यादा अधिकार रखते हैं।”

कुरान आगे इसी सूराः बकरा की आयत न. 229 में कहता है, “तलाक दो बार है। उसके बाद या तो ररिवाज के अनुसार बीवी को रख लेना है या अच्छे ढंग से विदा कर देना है।” इससे जाहिर है कि कुरान ने शौहर को तलाक की गलती सुधारने के दो मौके दिए हैं। आगली आयत 230 में कुरान कहता है, “अगर उसने फिर तलाक दे दिया तो वह औरत उसके लिए हलाल नहीं रही। वो औरत किसी और मर्द से निकाह करले और अगर वो भी उसे तलाक देदे तो फिर दोनों के आपस में मिलने में कोई गुनाह नहीं, शर्त ये है कि उन दोनों को अल्लाह की सीमाओं पर जमे रहने की उम्मीद हो। यह अल्लाह के दिए हुए नियम हैं जिनको वो बयान कर रहा है उन लोगों के लिए जो बुद्धि वाले हैं।” इससे साफ है कि कुरान में एक साथ तीन तलाक का कोई जिक्र नहीं है। बल्कि तलैक कै तरीका साफ-साफ समझाया गया है। कुरान में 16 सूरतों में तलाक से संबंधित कुल 44 आयतों हैं। इनमे कहीं भी एक सात तीन बार तलाक कह कर निकाह तो तोड़ने की बात नहीं कही गई है। तलाक के बाद भी औरतों के इज्जत से विदा करने की ताकीद की गई है।

शरीयत का दूसरा स्रोत है हदीसें। यूं तो हदीसें बहुत सी है। लेकिन सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम, तिरमिज़ी, अबू दाऊद, इब्ने माज़ा, और नसाई कुल मिलाकर इन छह हदीसों को प्रामाणिक औक विश्वसनीय माना जाता है। इनमें तलाक से जुड़ी हदीसों मे एक भी हदीस ऐसी नहीं हैं जिसमें मुहम्मद (सअ) ने एक साथ दी गई तीन तलाक को जायज़ बताया हो। इसके उलट नसाई की एक हदीस के मुताबिक एक साथ तीन तलाक देने की खबर पर मुहम्मद साहब का बेहद गुस्सा हो गए थे। उन्होंने इसे अल्लाह की किताब का मजाक उड़ाना कहा था। हदीसों के अध्यन से पता चलता है कि मुहम्मद साहब सामने, पहले खलीफ हज़रत अबू बक्र की खिलाफत में और दूसरे खलीफा हजरत उमर की खिलाफत के पहले दो साल तक एक बार में दी गई तीन तलाक को एक ही माना जाता था। बाद में खास परिस्थितियों में हजरत उमर ने एक इन्हें तीन मामने का हुक्म दिया लेकिन कुछ दिन इस फैसले को वापिस ले लिया था। सहीह मुस्लिम के पुराने संसकरण में इब्ने अब्बास के हवाले से लगातार तीन हदीसों में इसका जिक्र है लेकिन मौजूदा संस्करण में से तीसरी हदीस निकाल दी गई है।   

अब ये सवाल पैदा होता है कि अगर कुरान में एक बार में तीन तलाक का जिक्र नहीं है। हदीसों में भी इसे अच्छा नहीं बताया गया। तो फिर हमारे उलेमा इसे क्यों जारी रखने पर अड़े हुए हैं। जॉर्डन, मिश्र, सूडान, ईरान, इराक और पाकिस्तान समेत कई मुस्लिम देशों ने एक साथ दी गई तीन तलाक पर पाबंदी लगा रखी है। यानि अगर कोई एक साथ तीन बार तलाक देकर अपनी बीवी को छोड़ना चाहे तो वो ऐसा नहीं कर सकता। उसे तलाक की ठोस वजह बतानी होगी। सवाल उठता है कि अगर तमाम मुस्लिम देशों में ऐसा हो सकता हो तो फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। ये बात समझ से बाहर है कि हमारे उलेमा कुरान और हदीस की तमाम दलीलों को दरकिनार कर एक बार में तीन तलाक के चलन को ही जारी रखने पर ही क्यों अड़े हुए है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के झंडे तले तमाम मुस्लिम संगठन एकजुट होकर तीन तान तलाक के हक में आंदोलन चला रहे हैं। शरीयत बचाओ आंदोलन चलाया जा रहा है। ये सब मजहब के नाम पर आम मुलसमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर राजनीतिक रोटिंया सेंकी जा रही हैं। ऐसा करके हमारे तथाकथित आलिम मुस्लिम समाज का कोई भला नहीं कर रहे बल्कि उसे गुमरराही की दलदल में धकेल कर आन वाली पीढियों के भविष्य पर ग्रहण लगा रहे हैं।   

तथाकथित इन आलिमों के आचरण को अगर हम कुरान की कसौटी पर कस कर देखते हैं। आइए देखतें हैं कुरान ऐसे लोगों के बारे में क्या कहता है। सूराः अल माइदा की आयत न. 44-47 में अल्लाह ने उन यहूदी और ईसाई उलेमा को अकृतज्ञ, ज़ालिम, अत्याचारी और काफिर तक कहा है जो अल्लाह की उतारी हुई किताबों तौरेत और इंजील यानि बाइबिल के अनुसार फैसले नहीं करते थे। उसके बाद सूराः अल माइदा की आयत न. 48 में अल्लाह अपने नबी मुहम्मद (सअव) से मुखातिब होकर कहता है, “और हमने तुम्हारी तरफ एक किताब उतारी है। सच्चाई के साथ। ये किताब पिछली किताबों की पुष्टि करने वाली है और उनके विषयों की संरक्षक भी है। अतः तुम उनके बीच फैसला करो उसके अनुसार जो अल्लाह ने उतारा है। और जो सच्चाई तुम्हारे पास आई है उसे छोड़ कर उनकी (लोगों की) इच्छाओं का अनुसरण न करो।” कुरान की इन आयतों की रोशनी में साबित होता है कि तीन तलाक की पैरवी करने वाले लोग आलिम नहीं ज़ालिम है। अब तो मुस्लिम समाज के भीतर से इसके खिलाफ मजबूत आवाज उठने लगी है। अपने हक के लिए कई महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इस बार सुप्रीम कोर्ट इस मामले में ज्यादा गंभीर लग रहा है। उसने केंद्र सरकार से साथ अन्य पक्षों की राय भी मांगी है। केंद्र सरकार के महिला एवं बबाल विकास कल्याण मंत्रालय ने मुस्लिम देशों में प्रचलित तलाक के तौर तरीकों पर एक खास रिपोर्ट तैयार करके सुप्रीम कोर्ट को दी है। बेहतर होगा कि मुस्लिम समाज के सच्चे मजहबी रहनुमा आगे आकर एक साथ तीन तलाक के मसले को हल करके इसकी वजह से बड़े पैमाने पर बर्बाद हो रही मुस्लिम औरतों की जिंदगी बचाएं।

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