उत्तर प्रदेश चुनावों की अटकले

December 7, 2016, 12:51 pm
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शकीलुर रहमान

उत्तरप्रदेश में आगामी विधान सभा चुनावों को लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी जा रही हैं। रोज़नामा राष्ट्रीय सहारा अपने सम्पादकीय में लिखता है कि अभी तक यह निश्चित नहीं हो पाया है कि वहां किस मोर्चे में कौन सी पार्टी होगी और किस पार्टी का किस के साथ गठबंधन होगा। हर पार्टी का अपना वोट बैंक और अलग अलग एजेंडा है। इसी असमंजस के बीच उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा है कि] यद्यपि अपने प्रदर्शन और समर्थकों के ठोस नेटवर्क के आधार पर समाजवादी पार्टी सरकार बनाने की पूर्ण स्थिति में है] फिर भी उनका अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन हो जाए तो वह 300 सीटों पर जीत दर्ज करा सकते हैं। गठबंधन को लेकर अखिलेश यादव के इस पहल का धर्मनिर्पेक्ष जनता ने स्वागत किया है और ऐसी आशा की जा रही है कि अगर कांग्रेस भी इस ओर कोई सकारात्मक रवैया अपनाया तो यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव में मजबूत धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन के गठन और इसक स्पष्ट नतीजों से इंकार नहीं किया जा सकता। जनता ने हिन्दुस्तान में कभी अमरीका की तरह दो पार्टी राजनीतिक व्यवस्था देखा है लेकिन वर्षों से इसकी जगह दो राजनीतिक मोर्चे ने ले ली है और यह बात पूरी तरह से स्पष्ट हो चुकी है कि मजबूत मोर्चे के हाथों में ही सत्ता रहेगी। राष्ट्रीय स्तर पर तो एक मोर्चा वह है जिसका नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी कर रही है] जबकि दूसरे मोर्चे का नेतृत्व कांग्रेस के हाथों में है। लेकिन राज्यों में नेतृत्व क्षेत्रीय पार्टियों के हाथों में है। इसलिए इस हकीकत को समझे बिना कांग्रेस किसी भी राष्ट्र व्यापी मोर्चा की कल्पना नहीं कर सकती। कांग्रेस को राज्यों में धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन के गठन में सक्रिय भूमिका अदा करना चाहिए] क्योंकि राज्यों में जब तक समान विचार वाले राजनीतिक पार्टियों का गठबंधन सफल नहीं होगा राष्ट्रीय स्तर पर वह बीजेपी के नेतृत्व वाले मोर्चा के मुकाबले में कोई मोर्चा खड़ा करने सफल नहीं होगी। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में बिहार की तरह महागठबंधन की बात कई दिनों से चल रही है लेकिन हित के टकराव और वोट बैंक की चिंता के कारण कोई स्पष्ट समीकरण अब तक सामने नहीं आ सका है। शा यद] यही कारण है कि देशभर की धर्मनिर्पेक्ष जनता की चिंतायें बढ़ती जा रही हैं। इस देश की धर्मनिर्पेक्ष जनता की सर्वोपरि इच्छा है कि यूपी में एक धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन सामने आए और पूरी मजबूती से बीजेपी की सियासी आरजुओं को नाकाम कर दे। यद्यपि कांग्रेस के चुनावी सलाहकार प्रशांत किशोर ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव से भेंट कर के कोई फॉर्मूला जरूर पेश किया है] लेकिन पेंचदार शर्तों के जाल में अब भी यह मसला न जाने कहां फंसा हुआ है कि गठबंधन की कोई स्पष्ट नीति सामने नहीं आ पा रही है। किसी भी महान उद्देश्य को हासिल करने के लिए कुछ न कुछ बलिदान देना होता है] इस सत्यता को समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के रहनुमाओं को समझना चाहिए। कांग्रेस चूंकि बड़ी पार्टी है इसलिए उसे विशाल हृदयता का परिचय देना चाहिए और इस तथ्य को भी स्वीकार करना चाहिए कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी है और इसका प्रभाव भी सबसे अधिक है जिसका स्वाभाविक मांग है कि वह अधिक से अधिक सीटों पर वह अपने उम्मीदवारों को उतारना चाहेगी। पूरे देश की निगाहें उत्तरप्रदेश चुनावों पर टिकी हुई हैं। खासतौर पर धर्मनिर्पेक्ष जनता और मुसलमान कुछ ज्यादा ही चिंतित है] क्योंकि उत्तरप्रदेश में मुस्लिम मतदाता 17 प्रतिशत है और यही वह राज्य है जहां विधानसभा में मुसलमानों का सबसे अधिक प्रतिनिधित्व होता है। खतरा है कि अगर धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन नहीं बन पाया तो मुस्लिम और धर्मनिर्पेक्ष वोटर बिखर जाएगा। परिणामस्वरूप सांप्रदायिक गठबंधन को उभरने का कारण बन सकता है। ऐसे में हिन्दुस्तान के मुस्लिम रहनुमाओं और धर्मनिर्पेक्ष विचारधारा वाले सियासी लीडर उत्तरप्रदेश में धर्मनिर्पेक्ष गठबंधन को समय की आवश्यकता करार दे रहे हैं। अखबार मशरिक लिखता है कि 8 नवंबर को 1000 और 500 के करेंसी नोटों को रद्द किए जाने के बाद जहां सरकार ने काला धन रखने वालों पर शिकंजा कसना आरंभ किया वहीं काले दौलतीये भी अपनी चाल चलने लगे। ग्रामीण इलाकों में सरकार ने जिन गरीब लोगों के जन-धन खाते खुलवाये हैं और इस समय जिनकी संख्या करोड़ों में है] उनमें काला धन रखने वालों ने रातों रात 74321 करोड़ रुपये जमा करा दिए। काली दौलत वालों ने जन-धन खाताधारकों को कुछ दे-दिलाकर उनसे पोस्ट-डेटेड चेक भी ले लिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस सूरतेहाल का राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। उन्होंने मुरादाबाद जनसभा में जन-धन खाताधारकों को मुखातिब करते हुए कहा कि जिन ‘^^‘बेईमान’’ लोगों ने उनके खातों में काली दौलत जमा कराई है वे उन्हें वापस न दें और अगर वे उन्हें डरायें-धमकायें तो वे उन्हें (मोदी जी को) लिखें। 

उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों जो आगामी फरवरी और मार्च में होने वाले हैं मोदी की इन कार्यों का उनकी पार्टी बीजेपी के हक में खुशगवार प्रभाव पड़ सकता है। बड़े नोटों के विमुद्रीकरण के निहितार्थ नजर रखने वाले अर्थव्यवस्था विशेषज्ञों का अंदाजा है कि सरकार के इन कदमों के नतीजे में दस से बीस फीसद काला धन का अंत हो जाएगा। इसके नतीजे में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की झोली में डेढ़ लाख करोड़ रुपये की रकम आ जाएगी जिसे बैंक स्पेशल डिविडेंड के तौर पर सरकार के हवाले कर देगी। प्रधानमंत्री इस रकम से देश के ढाई करोड़ जन-धन खातों में पांच-दस हजार रुपये ट्रांस्फर कर देगी। इसके नतीजे में अवाम की सहानभूतियां नरेंद्र मोदी के हक में चली जाएंगी। निस्संदेह यह मोदी का मास्टर स्ट्रौक होगा जिससे सारे देश में हंगामा मच जाएगा कि जो काम किसी ने नहीं किया वह मोदी ने कर दिखाया। 2014 का लोकसभा चुनाव जिस तरह मोदी ने ^^सबका साथ] सबका विकास’’ का नारा लगा कर और विदेशी देशों से लाये गए काले धन को सभी हिन्दुस्तानियों के बैंक खातों में डालने के वादों पर जीता था] उसी तरह देश के भीतर से प्राप्त काले धन के वितरण से उत्तरप्रदेश का विधान सभा चुनाव जीता जा सकता है। गरीबों में ब्लैक की कमाई का इस तरह से वितरण चाहे कितना ही दिलकश हो] लेकिन हकीकत में यह एक तरह की रिश्वत होगी। इन हालात में यह सवाल उठता है कि क्या उत्तरप्रदेश के ईमानदार और गैरतमंद वोटर्स प्रतिरोध करते हुए हवा के रुख के खिलाफ चलना पसंद करेंगे\

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