गरीबों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगी जयललिता

December 8, 2016, 11:19 am
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जाहिद खान

तमिलनाडु की राजनीति में पिछले तीन दशकों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली एआइडीएमके प्रमुख और राज्य की लोकप्रिय मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन से एक युग का अवसान हो गया है। अपने पथप्रदर्शक और राजनीतिक गुरू एमजीआर की विरासत को संभालने के बाद वे छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनीं। उनके कार्यकाल में राज्य का काफी विकास हुआ। अपनी व्यापक राजनीतिक सूझ-बूझ और तेज तर्रार कार्यशैली से उन्होंने अपने विरोधियों को भी अपना कायल बना लिया था। वे जहां भी होती थीं, सबके आकर्षण का केंद्र बन जाती थीं। तमिल, तेलुगु और कन्नड़ के अलावा जयललिता शानदार अंग्रेजी बोलती थीं, वहीं हिंदी पर भी उनकी अच्छी कमान थी। वे सही मायने में जन नेता थीं। खास तौर से राज्य के गरीब और पिछड़े लोगों के दिलों में उनके प्रति काफी सम्मान था। वे उन्हें अपना सब कुछ मानते थे। यहां तक कि उनके समर्थन में किसी भी हद तक जाकर खड़े हो जाते थे। किसी राजनेता के प्रति देश में इस तरह की दीवानगी बहुत कम देखने को मिलती है। कर्नाटक के मैसूर में 24 फरवरी 1948 को एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी जयललिता दक्षिण भारतीय सिनेमा की एक शानदार अदाकारा थीं। महज पन्द्रह साल की उम्र में उन्होंने अपने आप को प्रमुख अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर लिया था। नायिका के तौर पर जयललिता का सफर ‘वेन्निरा अदाई’ (द व्हाइट ड्रेस) से शुरू हुआ, जो दो दशक तक चला। इस दौरान उन्होंने कई कामयाब फिल्में दीं। तमिल सिनेमा के एक और शानदार हीरो एमजी रामचंद्रन के साथ उनकी जोड़ी खूब मशहूर रही। जयललिता ने उनके साथ 28 फिल्में की। जिसमें से ज्यादातर फिल्में हिट हैं। उन्होंने 300 से ज्यादा तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और हिंदी फिल्मों में काम किया। एमजी रामचंद्रन की प्रेरणा से साल 1982 में जयललिता राजनीति में सक्रिय हुईं और वे ‘ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ पार्टी की मेंबर बन गईं। साल 1984 में एमजीआर ने जयललिता को राज्यसभा में भेज दिया। साल 1987 में एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद पार्टी को चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गयी। अपने ऊपर एक दम आन पड़ी इस जिम्मेदारी को जयललिता ने बखूबी निभाया। बोदिनायाकन्नूर सीट से चुनाव लड़कर वे साल 1989 में तमिलनाडु विधानसभा में पहुंची और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं। एमजीआर के निधन के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब लगा पार्टी टूट जाएगी, लेकिन जयललिता ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ से न सिर्फ पार्टी को एकजुट किया, बल्कि साल 1991 में उनके नेतृत्व में एआइडीएमके को विधानसभा चुनाव में जबरदस्त बहुमत मिला। इस तरह से साल 1991 में उन्होंने तमिलनाडु की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री का पद संभाला। उसके बाद तमिलनाडु की राजनीति में जयललिता का दौर शुरू होता है, जो उनकी जिंदगी के आखिर तक रहा। इस दरमियान उन्होंने पांच बार और राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभाला। तमिलनाडु की जनता जयललिता को भगवान की तरह पूजती थी। जनता के बीच उनका जबर्दस्त क्रेज था। उन्हें लोग प्यार से ‘अम्मा’ और ‘पुरातची थलाइवी’ (क्रांतिकारी नेता) के नाम से पुकारते थे। साल 2014 में जब जयललिता को जेल भेजा गया, तो उनके कई समर्थकों ने आत्महत्या तक कर ली थी। जयललिता की लोकप्रियता की वजह भी थी। अपने मुख्यमंत्रित्व काल में उन्होंने ऐसी कई सामाजिक, आर्थिक योजनाएं शुरू कीं, जो सीधे जनता से जुड़ती थीं। उन्होंने ‘अम्मा ब्रांड’ के तहत तकरीबन 18 लोक कल्याणकारी योजनाएं शुरू की। ‘अम्मा ब्रांड’ की ये सभी योजनाएं या तो पूरी तरह मुफ्त थीं, या फिर उन पर भारी सब्सिडी दी जाती थी। इन योजनाओं में शहरी गरीबों के लिए मात्र 1 रुपए में भोजन उपलब्ध कराने के लिए ‘अम्मा कैंटीन’ प्रमुख थी। इसी तरह गरीबों के लिए उन्होंने ‘अम्मा साल्ट’, ‘अम्मा वाटर’ और ‘अम्मा मेडिसीन’ योजनाएं भी शुरू की थीं। कन्या भ्रूण हत्या की समस्या से निपटने के लिए उन्होंने राज्य में ‘क्रैडल टू बेबी स्कीम’ शुरू की, तो बच्चियों को जन्म देने वाली महिलाओं को मुफ्त सोने का सिक्का दिया जाता था। ‘गोल्ड फॉर मैरिज स्कीम’ के तहत आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को डिग्री या डिप्लोमा पूरा करने पर सरकार की ओर से चार ग्राम सोना और 50 हजार रुपए तक का कैश दिया जाता था। राज्य में पहली बार महिला थाने खुलवाने का श्रेय भी जयललिता को जाता है। उन्होंने महिला थाने खुलवाए और वहां सिर्फ महिला पुलिसकर्मियों की तैनाती की। सामाजिक योजनाओं के अलावा जयललिता के कार्यकाल में राज्य के अंदर ऑटोमोबाइल और आईटी जैसे क्षेत्र में भी काफी विदेशी निवेश आया। इन क्षेत्रों में राज्य ने अच्छी तरक्की की। 

अपने जनकल्याणकारी कामों के लिए जयललिता जहां हमेशा चर्चा में रहीं, तो कुछ वजह से वे विवादों में भी रहीं। मसलन भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले में साल 1996 में जब उनके घर पुलिस ने छापा मारा, तो पुलिस को वहां से 10 हजार से ज्यादा साड़ियां और 750 जोड़ी जूते मिले थे। इस खबर से पूरे देश में सनसनी मच गयी थी। साल 1998 में जयललिता और उनकी खास सहेली शशिकला समेत कुछ लोगों पर तांसी जमीन घोटाले का इल्जाम लगा। उनके इस फैसले पर भी काफी विवाद रहा, जब उन्होंने साल 2001 में हड़ताल पर जाने वाले राज्य के 2 लाख कर्मचारियों को एक साथ बर्खास्त कर दिया। भ्रष्टाचार के मामलों में जयललिता को दो बार मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। पहली बार साल 2001 में और दूसरी बार साल 2014 में। उच्चतम न्यायालय द्वारा तांसी मामले में चुनावी अयोग्यता ठहराने से सितंबर 2001 के बाद करीब 6 महीने तक वह पद से दूर रहीं। सितम्बर 2014 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक बार फिर उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। लेकिन दोनों ही मौकों पर वे नाटकीय तौर पर अपनी वापसी करने में कामयाब रहीं। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी पार्टी में उनको कोई चुनौती नहीं मिली। वे एआइडीएमके की निर्विवाद नेता बनी रहीं। आखिरी बार जब जयललिता जेल से रिहा हुईं, तो उनकी तबीयत नासाज रहने लगी थी। बुखार एवं निर्जलीकरण की शिकायत के चलते उन्हें 22 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तब से ही उनका इलाज चल रहा था, लेकिन कोई दवा और दुआ उनके काम नहीं आई। करीब 74 दिन जिंदगी और मौत के बीच जूझते हुए जे जयललिता ने 5 दिसम्बर, 2016 को इस जहां से अपनी आखिरी विदाई ली। गरीबों और वंचितों के लिए किए गए अपने बेहतरीन कामों से वे हमेशा उनके दिलों में जिंदा रहेंगी।

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