जुमलों की सरकार और नोटबंदी

December 7, 2016, 12:37 pm
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अंशुमान त्रिपाठी

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तो धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर को अवतार लेना पड़ता है। सवाल आज के संद्रभ में देखा जाए तो धर्म क्या है और धर्म की ग्लानि कब होती है। आज के दौर में धर्म यानि धारण करने योग्य मूल्य हैं-लोकतंत्र, समता, समानता, सर्वधर्म समभाव, न्याय वगैरह –वगैरह। अगर पोस्ट-ट्रुथ या उत्तर-सत्य काल के संदर्भ में इसे समझा जाए तो भारतीय जन मानस को समझना आसान होगा। उत्तर-सत्य युग या काल वो समय या दौर है जब लोकतंत्र-तार्किकता-वैज्ञानिकता-समता-समानता-न्याय के विचारों पर चल कर भी समाज को अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते हैं। वस्तुनिष्ठता से जीवन और समाज से जुड़े प्रश्नों का हल नहीं निकल पाता है। इन हालात में गहन निराशा औऱ हताशा का माहौल बढ़ता है। तर्क और वैज्ञानिकता के प्रति अरुचि का माहौल बन जाता है। ऐसे में जनमत भावप्रधान हो जाता है। भावना-आधारित तर्कों का बोलबाला हो जाता है। जनता को अधिनायकवादी तंत्र की तलाश होती है। आज देश की राजनीति को समझने से पहले उत्तर सत्य यानि पोस्ट ट्रुथ को समझना ज़रूरी है। पोस्ट-ट्रुथ यानि उत्तर सत्य काल दुनिया के राजनीतिक विश्लेषकों के बीच एक अहम बहस का मुद्दा है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इसे सन् 2016 का वर्ड ऑफ द इयर चुना है। दुनिया भर में बढ़ रही भावनात्मक राजनीति को समझने के लिए इस नए पारिभाषिक शब्द का इस्तेमाल किया जा रहा है। सबसे पहले 1992 में इस शब्द का प्रयोग हुआ। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के मुताबिक एक सर्बियन-अमेरिकन नाटककार स्टीव टेसिच ने मशहूर वाटरगेट कांड, इरान-कोंत्रा स्कैंडल और गल्फ वार से जुड़ी घटनाओं के सिलसिले में इन शब्दों का इस्तेमाल किया। उस समय उत्तर-सत्य का प्रयोग झूठ करार देने के अर्थ में हुआ। लेकिन 2004 में राल्फ कीज़ नाम के लेखक ने बकायदा राजनीति के इस दौर को उत्तर-सत्य काल बताया। इसी साल अमरीकी पत्रकार एरिक आल्टरमेन ने उत्तर-सत्य राजनीतिक माहौल को न्यूयार्क मे हुए नौ सितंबर के आतंकी हमले पर बुश प्रशासन के बयानों से जोड़ कर परिभाषित किया। इसी साल एक लेखक कॉलिन क्रोच ने उत्तर सत्य को और विस्तार दिया। उन्होंने इससे जोड़ कर एक नया शब्द “उत्तर लोकतंत्र” दिया। इससे उनके मायने एक ऐसे लोकतंत्र से था जिसमें चुनाव तो होते हैं लेकिन राजनीतिक बहस बहुत सुनियोजित और सुविचारित तरीके से की जाती है। इसके लिए पेशेवर लोगों और पेशेवराना तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। उन्होंने और स्पष्ट कर दिया कि ये एडवर्टाइज़िंग उद्योग का मॉडल है जो राजनीतिक संवाद के जरिए किसी व्यक्ति, पार्टी, विचार या सरकार के प्रति अविश्वास और अनास्था पैदा करता है। लेकिन उत्तर-सत्य बकायदा राजनीति की एक विश्लेषण पद्धति के तौर पर तब जन्मा जब 2010 में डेविड रॉबर्ट्स नामक एक ब्लॉगर ने इसे एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति के अर्थ में प्रयोग किया जिसमें राजनीति का नीति या योजना से कोई वास्ता ना हो। उसके बाद से उत्तर-सत्य दुनिया में घट रही राजनीतिक घटनाओं को समझने के लिए एक पैमाना बन गया। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया. भारत और तुर्की में हो रही राजनीतिक बदलाव को उत्तर-सत्य काल की राजनीति के दौर का नाम दिया। उसके बाद तो बहुत से राजनीतिक चिंतकों ने ब्रेक्ज़िट यानि यूरोपीय यूनियन से निकलने के लिए ब्रिटेन के जनमत संग्रह को इसी अर्थ में प्रयोग किया। उत्तर-सत्य काल को समझने के लिए सबसे बेहतरीन मिसाल हाल में हुए 2016 के अमरीकी चुनाव के चौंकाने वाले नतीज़ों की दी जाने लगी। इसके बाद दुनिया के हर कोने में होने वाले दक्षणपंथी उभार को उत्तर-सत्य से जोड़ कर देखा जाने लगा। भारतीय राजनीतिक  इस उत्तर-सत्य काल को समझने से पहले एक नज़र  डालते हैं यूरोपियन यूनियन से अलग होने के लिए ब्रिटेन के जनमत संग्रह के नतीजों और अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव के नतीजों पर। जिस तरह से यूरोपियन यूनियन में ब्रिटेन की भागीदारी थी और फायदेमंद भविष्य था, उसे देखते हुए जनमत संग्रह के नतीजे सबको चौंकाते हैं। लेकिन जब ईयू से अलग होने की मांग उठी तो यूनियन में बने रहने के पक्ष में आर्थिक असुरक्षा भरे भविष्य की चेतावनी भरी दलीले दी गई। जिनसे ब्रितानी समाज के हर दूसरे शख्स में यूरोपियन यूनियन के लिए नकार भाव उपजा। वहीं यूनियन से अलग होने पर हर हफ्ते राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजना के लिए 350 मिलियन पाउंड की राशि के इस्तेमाल का जुमला छोड़ लोगों में लालच जगाया गया। हालांकि आंकड़ा झूठा था लेकिन जिस तरह से गुब्बारा फुलाया गया, वो अंदाज़ ज़बर्दस्त था। अंदर ही अंदर इसे ब्रिटिश अस्मिता और नस्लवादी भावना से भी जोड़ा गया। यही नज़ारा अमरीकी चुनाव में देखने को मिला। लंबे प्रशासनिक अनुभव के बावजूद हिलेरी क्लिंटन के मुकाबले राजनीति  में नौसिखिए थे डोनॉल्ड ट्रंप। हिलेरी ने ज़बर्दस्त आंकड़ों, तर्कों और अमरिकी प्रशासन की नीतियों के मद्देनज़र राजनीतिक बहस में ट्रंप को स्टंप किया। लेकिन ट्रंप का अबूझ, नादान होना और कुतर्कों और जुमलों का सहारा लेना काम आया। अपने कार्यकाल में किसी ठोस कार्य योजना को पेश करने के बजाय ट्रंप का प्रचार ओबामा प्रशासन के खिलाफ अविश्वास पैदा करने पर टिका रहा। प्रचार के जरिए किया पैदा किया गया नस्लवादी उभार अब तो और ज़्यादा असर दिखा रहा है।  विश्व में बदलाव के दौर कई देशों पर असर डालते हैं। क्योंकि इतहास गवाह रहा है कि ज़्यादातर देश एक दूसरे से सामाजिक आर्थिक और राजनैतिक तौर पर प्रभावित होते रहे हैं। आधुनिक विश्व में औद्योगिक क्रांति, फ्रांसीसी क्रांति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की स्थापना के आंदोलनों और पूंजीवाद के बाद नव पूंजीवाद के सभी देशों में अन्योन्याश्रित संबंधों को समझा जा सकता है। विचार चेतना पूरे भूमंडल पर असर डालती है। इसी तरह नब्बे के दशक से सत्य को नकारने और यथार्थ के प्रति अनास्था का दौर राजनीति में देखने को मिल रहा है। राजनीतिक स्वार्थ के तर्कों ने लोगों को इतना उदासीन बना दिया है कि दुनिया भर में लोगों को सपना दिखाने वाले की ज़रूरत महसूस हो रही है। दरसल पूंजीवाद ने अपने स्वार्थ, कच्चा माल,पूंजी,सस्ते श्रम औऱ बाज़ार की तलाश में नई तकनीक के जरिए दुनिया को जोड़ने वाली भूमंडलीय व्यवस्था की परिकल्पना की है। दुनिया एक गांव बनाया जा रहा है। श्रम के शोषण और मुनाफे के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस नई व्यवस्था की ट्रस्टी बन चुकी है। कल्याणकारी पूंजीवाद का मुखौटा पहनाया जा रहा है। चंद कर्मचारियों को मालिकाना भागीदारी को बड़ा शोशा बनाया जा रहा है। लेकिन अलग अलग समाज अपनी पहचान के लिए, अपने हित के लिए नई व्यवस्था में घुटन महसूस कर रहे हैं। पूंजीवादी विकास की अवधारणा की दलीलें कितनी भी सही हों, सच्चाई ये ही है कि पूंजीवाद जिस तरह के अवरुद्ध विकास को जन्म देता है, वही इसें विकृति का कारण बन रहा है। गरीब-अमीर की बढ़ती खाई, ज्यादा से ज्यादा संसाधनों पर लगातार मुठ्ठी भर लोगों का कब्ज़ा और जीवन यापन के लिए लगातार बढ़ते संघर्ष के कारण समाज किसी अधिनायक की तलाश करने लगता है। अपने देश में प्रशासनिक बदइंतज़ामी, उच्च वर्ग के हितों के अनुरूप बनती नीतियां, क्रोनी कैपिटलिज्म और भृष्टाचार की वजह से लोग ये कहने में गुरेज नहीं करते हैं कि देश को एक हिटलर की ज़रूरत है। यही वजह है कि आज भी गांव, जिले और राज्य स्तर पर नेता उसी को माना जाता है जो दबंग हो, प्रशासनिक अफसरों को सार्वजनिक रूप से अपमनित करने की क्षमता रखता हो और साम-दाम-दंड और भेद से काम कराना जानता हो। आज़ादी के बाद से देश की संवैधानिक संस्थाओं, सरकार और राजनीति के खिलाफ नकारात्मक प्रचार का ही ये असर दिल्ली राज्य औऱ 2014 के आम चुनाव में देखने को मिला। इस दौरान एडवर्टाइज़िंग तकनीकों का इस्तेमाल कर नरेंद्र मोदी की लार्जर देन लाइफ छवि बनाई गई और चंद जुमलों का घनघोर प्रचार किया गया। ऐसे में तमाम घोटालों को लेकर जनमानस के बीच धारणा बन गई कि नरेंद्र मोदी लौहपुरुष हैं, उनका छप्पन इंच का सीना है, वो एक के बदले दुश्मन के दस सिर ला सकते हैं और हमारे अच्छे दिन आ सकते हैं।   उत्तर सत्य राजनीति का वो सत्य है जो निराशा के बीच जनमानस में लंबे समय से पनपता है, बढ़ता और विशाल रूप ले लेता है। कहना ना होगा कि नरेंद्र मोदी इसी सोच और आधुनिक मार्केटिंग तकनीक के उत्पाद भर हैं। इसके लिए वैसे ही जुमलों का इस्तेमाल किया गया जैसा ब्रेक्ज़िट के लिए ब्रिटेन में किया गया य़ा बाद में अमरीकी चुनाव में डोनॉल्ड ट्रंप के चुनावी रणनीतिकारों ने। केंद्र में सरकार बनते ही लोगों ने अच्छे दिनों के लिए उल्टी गिनती शुरू कर दी थी। लेकिन बीजेपी के चतुर-सुजान नेताओं ने अच्छे दिनों को और हर किसी के खाते में पंद्रह लाख आने की बात को भी बीजेपी के कुछ चतुर-सुजान नेताओं ने  जुमला करार दिया। इसके बाद भी भारत की स्वप्नजीवी जनता को प्रधानमंत्री से उम्मीद बरकरार रही। प्रधानमंत्री भी बहुत कम समय में 22 लाख जनधन खाते खुलवाने और एलपीजी पर सब्सिडी वाले सिलेंडर सरेंडर करवा कर अपनी पीठ ठोंकते रहे। उनके समर्थकों ने भी उन्हें सुपरमैन की तरह पेश किया। ऐसा सुपरमैन जो गुजरात में आतंकवादियों से मुठभेड़ के जरिए निपटना जानता हो, उत्तराखंड त्रासदी में लोगों को निकलवाने की क्षमता रखता हो या नेपाल में भूकंप आने पर प्रधानमंत्री कार्यालय से आपदा राहत की मॉनटरिंग कर सकता है। हर मर्ज की एक दवा मोदी। नए नारे गढ़ने के बजाय मोदी-मोदी-मोदी का नारा गढ़ा गया। अबकी बार बीजेपी सरकार के बजाय अबकी बार मोदी सरकार का नारा खुद बीजेपी पर भारी पड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख को उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध करवा कर राजगुरु बना लिया गया। युवाओं को आगे लाने के नाम पर बीजेपी का पूरा राष्ट्रीय नेतृत्व तहस-नहस कर दिया गया। कुछ मार्गदर्शक बन कर मार्ग से भटक गए तो कुछ गुमशुदा हो गए। सामूहिक नेतृत्व हवा हो गया। केंद्रीय मंत्री-सासंद किसी काम के ना रहे। कुछ ने प्रधानमंत्री के भोंपू का काम शुरू कर दिया। कहा गया कि प्रधानमंत्री हर स्तर पर भ्रष्टाचार रोकना चाहते हैं, इसीलिए किसी भी मंत्री को अपनी पसंद के सहायक तक नहीं दिए गए। कहने को तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है, लेकिन सचिव सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय को रिपोर्ट करते रहे। ढाई साल में एक पूरा अधिनायक तंत्र विकसित हो गया। लेकिन ये अधिनायकवाद इसके नेता को ज़मीन से काट देता है। उसके इर्दगिर्द रहने वालों की संख्या सीमित हो जाती है। वो उसके सामने अच्छे दिन का ऐसा इंद्रजाल बुन देते हैं जिसमें स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन का सपना होता है और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में विश्व गुरु होने का अहंकार पैदा हो जाता है। अधिनायक खुद इस इंद्रजाल का बंदी हो जाता है। कोई आश्चर्य नहीं कि आने वाले दिनों में इस अधिनायक में देवत्व का आरोपण भी कर दिया जाए। इन्हीं हालात में वो दूसरों से सलाह-मशविरा करना बंद कर देता है। जनता का अपने उपर विश्वास को देख उसे अपनी प्रशासनिक क्षमताओं पर अतिरिक्त आत्म-विश्वास आ जाता है। इसी प्रशासनिक आत्म-विश्वास का अतिरेक है देश में नोटबंदी।

दरसल चुनावी चंदे की अदायगी और लोकलुभावन नारे का मिश्रित रूप है नोटबंदी। टेलीकॉम कंपनियों में अपने मोटे –मोटे फाइबर ऑप्टिक पाइपों के जरिए इंटरनेट बेचने, सारा व्योपार-प्रशासन-कारोबार को ऑनलाइन कर सदियों तक अकूत धन कमाने की इच्छा है। इन कंपनियों के मालिकों की चाहत है कि वो अपने ही जीवन काल में इस अथाह पैसे के मालिक बन सकें। इसके लिए ज़रूरी है कि हर शख्स के लिए रोटी और कपड़ा के बाद और मकान से पहले डेटा खरीदना ज़रूरी हो जाए। अब लोगों को डिजिटल ट्रांजेक्शन सेवा के लिए भुगतान भी करना पड़ रहा है। जबकि पहले नोट के जरिए सीधे भुगतान कर पैसा बचाया जा सकता है। हर डेटा पर पाई-पाई की कमाई की योजना है नोटबंदी। इस महान व्यापारिक योजना को कालेधन से जोड़ दिया गया। ये जानते हुए कि नकदी के रूप में कालाधन कुल छह फीसदी से ज्यादा नहीं है। ये जानते हुए भी कि देश में कुल दो फीसदी से ज्यादा लोग डिजिटल ट्रांजेक्शन नहीं करते हैं। 25 फीसदी से ज्यादा लोगों के पास स्मार्ट फोन नहीं है। बाज़ारों में पीओएस मशीन ज़रूरत से आधी भी नहीं हैं। सत्तर फीसदी से ज्यादा लोग नकदी में लेनदेन करते हैं। लेकिन काले धन के खिलाफ मिशन के मुलम्मे में टेलीकॉम कंपनियों का महा-सपना पूरा कर दिया गया। मुलम्मे को मजबूत बनाने के लिए आतंकवाद के पैसे पर रोक लगाने की बात कही गई। जबकि आंकड़े बताते हैं कि आम लोगों की नकदी में आतंकवाद का पैसा नाम-चार को भी नहीं है। यही वजह है कि सिर्फ पुराने नोट ही बंद नहीं किए गए, बल्कि आम आदमी की जमा रकम को गैरकानूनी तरीके से लंबे वक्त तक के लिए बंधक बना लिया गया। लोगों को ज़रूरी भुगतान के लिए ऑनलाइन लेनदेन करना पड़ रहा है। देश की साठ फीसदी जनता देहात में रहती है। ये भी जानने की कोशिश नहीं की गई कि ग्रामीण क्षेत्र में बिजली, इंटरनेट या बैंकिंग व्यवस्था के क्या हालात हैं। ये सब गोपनीयता के नाम पर हुआ। कालेधन को निकालने के लिए गोपनीयता का तर्क इन सारे सवालों पर भारी पड़ रहा है। जबकि अब पंद्रह लाख करोड़ रुपयों में से बारह लाख करोड़ वापिस भी आ गया है। ज़ाहिर है कि कालाधन निकालने की मुहिम को बहुत कामयाबी नहीं मिल पाई। लिहाज़ा इस मुहिम को अब कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने का अभियान बताया जा रहा है। इसे देश प्रेम से जोड़ कर राष्ट्रवाद के नारे पर जनमत बनाया जा रहा है। सवाल ये है कि नोटबंदी के तीन हफ्ते गुजर जाने के बाद भी जनमत प्रधानमंत्री के साथ नज़र आ रहा है। तमाम सर्वेक्षण और मीडिया भी यही प्रचारित कर रहे हैं। हकीकत भले ही कुछ और हो, लेकिन इतना तो तय है कि आम जनता बदइंतज़ामी से परेशान भले ही है लेकिन नोटबंदी की मंशा पर सवाल नहीं उठा रही है। आम जनमानस को समझने के लिए आज़ादी के बाद की देश की राजनीति से मोहभंग के कारणों को समझना होगा। कार्यपालिका-विधायिका औऱ पूंजीपतियों के गठबंधन से उपजे हालात से जनता में हताशा घर कर गई है। जनता की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था डगमगा रही है। न्यायपालिका से भी बहुत उम्मीद नहीं बची है। आंकड़ों और तर्कों का जनता को भरमाने के लिए इतना इस्तेमाल हुआ है कि अब उन पर भी लोगों का भरोसा नहीं रहा। लगातार संवैधानिक संस्थाओं और आदर्शों के खिलाफ प्रचार लोगों के जेहन में घर कर गया। हालात ये पैदा हो चुके हैं कि सोशल मीडिया में झूठा प्रचार भी सोच पर खासा असर डाल रहा है। अब जब कालेधन के खिलाफ मुहिम नाकाम हो गई है तो भी जनता को उनसे बहुत उम्मीदे बची हुई हैं। प्रधानमंत्री खुद को शहीद की तरह पेश कर रहे हैं। वो उत्तर-सत्य राजनीति को पूरी तरह इस्तेमाल करने में जुटे हुए हैं। ये उत्तर-सत्य काल ही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में जनता प्रकाश पुरुष की छवि देख रही है। उनमें जन नायक तलाश रही है। उनमें अधर्म का नाश करने वाले और देश का अभ्युत्थान करने वाला महानायक तलाश रही है।

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